रविवार, २९ जून २००८

ज्योतिष और हम

आम जन के मन में ज्योतिष को लेकर एक भ्रांति सदैव विद्यमान रहती है। वह जितनी शिद्दत से इस पर विश्वास करता है उतनी ही तत्परता से इस पर परिहास के लिये भी तैयार रहता है। हम लोगों के समक्ष ज्योतिष की उपादेयता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं तथा निज कार्य के लिये इसके उपयोग के लिये तैयार भी रहते हैं। यह प्रवृत्ति ख्यातनाम लोगों में ज्यादा दिखाई देती है।

ज्योतिष का अर्थ है ज्योति पिण्डों का अध्ययन। यह कोई निरा कौतुक नहीं है। स्थापित सिद्धांतों और नियमों के आधार पर यह शास्त्र किसी घटना का परिकलन और विवेचन स्वतंत्र रूप से करता है। किसी विषय की आलोचना करने के लिये हमें उस विषय का ज्ञान होना नितांत आवश्यक है। जो ज्योतिष को परिहास का विषय समझते हैं वे अज्ञ हैं और कुछ न कुछ अनर्गल कहकर स्वयं के प्रकाशन का निम्न कोटि का प्रयास करते हैं।

आज हम विवाह संस्कार के लिये कुण्डली मिलान की उपादेयता पर कुछ चर्चा करने का प्रयास करते हैं। ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक कहा गया है कुण्डली मिलान की प्रक्रिया में भी चंद्रमा का ही सर्वाधिक महत्व है। ज्योतिष के माध्यम से दो अनजान विपरीत लिंगी व्यक्तित्वों के पारस्परिक सामंजस्य का पता किया जा सकता है और बाद में पश्चाताप अथवा किसी विपरीत निर्णय पर पहुंचने की स्थिति से बचा जा सकता है। इस प्रक्रिया में दोनों व्यक्तियों के योनि, वश्य, नक्षत्र, गण, नाड़ी, चंद्रमा आदि का विचार किया जाता है। ये वह कारक हैं जिससे स्वभाव, प्रेम, उन्नति तथा सामंजस्य का विचार होता है। विवाह के सफल के होने के लिये समस्त आवश्यक बातों पर ज्योतिष के माध्यम से गौर किया जा सकता है। यह मात्र कोई कर्मकांड या टोना-टोटका न होकर एक स्थापित विज्ञान है और यदि जन्म विवरण प्रामाणिक हो तो अन्य बातों के साथ-साथ कुण्डली मिलान की प्रक्रिया पर भी विचार करना लाभदायक रहेगा।

गुरुवार, १९ जून २००८

भारतीय ज्योतिष तथा रोग विचार

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" href="http://www.chitthajagat.in/?claim=1dc6d2x2wr9w">चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" alt="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" src="http://www.chitthajagat.in/images/claim.gif" border=0>
अपने भविष्य की जानकारी करने की उत्सुकता हम सभी में समान रूप से विद्यमान है। इसके लिए पिछले हजारों वर्षों में कई तरीके हमारे बुद्धिमान पूर्वजों ने खोजे हैं। ज्योतिष के द्वारा फलकथन सर्वाधिक विश्वस्त तथा प्रचलित तरीका है। एक सहज तर्कशक्ति के द्वारा हम इस पर अविश्वास की भावना भी रखते हैं। इसका मूल कारण मानव की हर विषयवस्तु पर शंका करना है। मानव ने अपनी जिज्ञासु तथा शंकालु प्रवृत्ति के कारण ही आज इतनी प्रगति की है। अतः यह शंका भी एक स्वाभाविक प्रक्रिया ही है। इसी शंका और जिज्ञासा ने मुझे ज्योतिष के अध्ययन की ओर खींचा और Indian Council of Astrological Science, चेन्नई के जयपुर चेप्टर से वर्ष 2002 में ज्योतिष की विधिवत शिक्षा प्राप्त करना प्रारंभ किया। वर्ष 2004 में ज्योतिष विशारद उत्तीर्ण करने के पश्चात गुरूजनों की कृपा से नियमित ज्योतिषीय विश्लेषण प्रारंभ किया और यह देखकर हैरान रह गया कि हमारे शास्त्रों में वर्णित ज्योतिषीय योगादि (जो हजारों वर्षों पूर्व विद्वानों ने खोजे हैं) कितने सटीक हैं। जिस व्यक्ति को हमने कभी देखा भी नहीं, उसकी जन्मकुंडली उसके जीवन की दशा और दिशा के समस्त रहस्य हमें दिखाने लगती है।
ज्योतिष फल कथन करते हुए रोग और ज्योतिष के आपसी संबंध का तानाबाना और स्पष्ट होने लगा (वैसे मेडिकल एस्ट्रोलाजी हमारे पाठ्यक्रम में था)। अब इसी विषय (हृदय रोगों का ज्योतिषीय अध्ययन) पर शोधरत हूँ। इस संदर्भ में मैंनें पिछले कई दिनों में वेब पर सम्पर्क करने के प्रयास किये हैं और यह ब्लाग भी उसी क्रम में तैयार किया गया है। हालांकि मुझे इंटरनेट पर अभी तक ज्योतिष प्रेमी विद्वान कम ही मिले हैं किंतु आस पर दुनिया कायम है। मैं इस ब्लाग के जरिए आपके अनुभव जानना चाहता हूँ।
मैं आपसे यह कहना चाहूंगा कि ज्ञान अनंत है और उसे प्राप्त करने में एक मानव जीवन की अवधि बेहद कम है। हम सिनर्जीस्टिक एफर्ट के द्वारा एक दूसरे की मदद कर सकते हैं।
संजीव शर्मा
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